प्रधानमंत्री के बतौर चुने जाने से पहले नरेन्द्र मोदी ने किसानों से वादा किया था कि न्यूनतम समर्थन मूल्य ऐसा तय किया जायेगा जिससे उत्पादन लागत पर किसानों को कम से कम 50 प्रतिशत लाभ सुनिश्चित होता हो. लेकिन वास्तविकता में न्यूनतम समर्थन मूल्य को घटा दिया गया है (लाइव मिंट, 2 जून 2016).
ऽ अगर हम प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य की तुलना उसकी उत्पादन की लागत से करें यह आंकड़ा और भी स्पष्ट हो जाता है. उदाहरणार्थ 2009-10 में धान के लिये समर्थन मूल्य 950 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि ‘कृषि लागत एवं मूल्य आयोग’ (एग्रिकल्चरल कॉस्ट एंड प्राइस कमीशनद्ध द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार उसके उत्पादन की अनुमानित लागत 670 रुपये प्रति क्विंटल ठहरती थी. इसका अर्थ था कि किसानों को लाभ का प्रतिशत लगभग 42 प्रतिशत था. 2015 में समर्थन मूल्य धान का समर्थन मूल्य प्रति क्विंटल 1,410 रुपये था, जबकि उसके उत्पादन की प्रति क्विंटल लागत 1,324 रुपये थी, यानी किसानों को उत्पादन से महज 6.5 प्रतिशत का लाभ हुआ!
ऽ 2014 से लेकर 2016 तक के तीन वर्षों में मोदी सरकार ने चावल के समर्थन मूल्य में मात्रा 3.9 प्रतिशत (औसतनद्ध प्रति वर्ष का इजाफा किया है, जबकि मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले तीन वर्षों के दौरान समर्थन मूल्य में 9.5 प्रतिशत प्रति वर्ष की वृद्धि हुई थी. इसी प्रकार राजग के शासनकाल में गेहूं के समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी महज 4.1 प्रतिशत (औसतनद्ध प्रतिवर्ष की गई, जबकि उसके पहले के तीन वर्षों के दौरान 7 प्रतिशत प्रति वर्ष बढ़ोत्तरी की गई थी.