- वर्तमान भारत में समानता के लिए महिलाओं की बढ़ती दावेदारी और तीव्र होती आकांक्षाओं, जो जड़-जमाये बैठी पितृसत्ता को चुनौती दे रही है, को हर क्षेत्र में देखा और महसूस किया जा सकता है. इस दावेदारी और बढ़ती जन भागीदारी के ठीक विपरीत, भारत में इसके साथ ही हम महिलाओं के खिलाफ बेरोकटोक तेज होती यौन एवं पितृसत्तात्मक हिंसा तथा महिलाओं द्वारा कठिन संघर्ष के जरिये हासिल अधिकारों और आजादी पर खुले एवं संगठित पितृसत्तात्मक हमले (शारीरिक और वैचारिक दोनोंद्ध देख रहे हैं. इसके साथ ही भारत में महिलाओं के कुपोषण, भूख और प्रसव के दौरान मातृ-मृत्यु की दर पूरे विश्व में बदतरीन उदाहरण पेश करती है. यह अंतरविरोध या विरोधाभास आधुनिक भारत की चारित्रिक विशिष्टता को परिभाषित करता है.
- यह सच्चाई है कि पूंजी और पंचायत जैसी राज्य की संस्थाओं और वैश्विक पूंजी एवं भारतीय राज्य से घनिष्ठ रूप से जुड़े एनजीओ के नेटवर्क ने ग्रामीण इलाकों में अपनी घुसपैठ बढ़ा दी है, जिसके फलस्वरूप महिलाओं की अच्छी-खासी संख्या घरों से बाहर निकलकर श्रमशक्ति के रूप में और राजनीतिक क्षेत्र में आ गई है. लेकिन इस दावेदारी को रोकने के लिये वर्ग, जाति एवं लैंगिक-वर्चस्व की शक्तियां, चरम बर्बर उपायों समेत समस्त साधनों का इस्तेमाल करते हुए, संघबद्ध हो रही हैं, जबकि राज्य और पूंजी, महिलाओं को श्रमशक्ति में शामिल करने के क्रम में, वास्तव में मौजूदा पितृसत्तात्मक ढांचों और विचारधाराओं का, जो महिलाओं की यौनिक एवं घरेलू गुलामी तथा सामाजिक अधीनता के लिये जिम्मेवार हैं, इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें शक्तिशाली बना रहे हैं और निरंतरता प्रदान कर रहे हैं. इस प्रकार भारतीय महिलाएं दोनों व्यवस्थाओं - सामंती उत्पीड़न के साथ-साथ पूंजीवादी शोषण एवं अमानवीकरण की प्रणाली - की बदतरीन शिकार हैं, खास तौर पर इसलिये कि वृद्धि का नव-उदारवादी मॉडल सामाजिक-आर्थिक ढांचों, रीति-रिवाजों और मूल्य-प्रणालियों में सामंतवाद के कई अवशेषों को संरक्षित करता है, उससे लाभ उठाता है और कुछेक मामलों में संशोधित रूपों में उनका पुनरुत्पादन करता है.
- सामंती-पितृसत्तात्मक विरोध के बावजूद, महिलाएं और अधिक सक्रियता के साथ सामाजिक एवं राजनीतिक भूमिका का निर्वाह करने के लिये नये अवसरों - मसलन, स्कूली शिक्षा, रोजगार के विभिन्न अवसर तथा पंचायती राज संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान - का उपयोग करने की कोशिश कर रही हैं. नए अवसरों एवं अनुभवों ने महिलाओं में आत्मविश्वास और राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया है. महिलाओं की बढ़ती गतिशीलता और सार्वजनिक भूमिका (रोजगार और साथ-ही-साथ राजनीतिक जीवन मेंद्ध घरेलू एवं सामाजिक जीवन में परंपरागत पितृसत्तात्मक व्यवस्थाओं एवं प्रवृत्तियों को डगमगा रही है, जिसके परिणामस्वरूप, न केवल लैंगिक भूमिका एवं विचारधारा में प्रगतिशील बदलाव हुआ है, बल्कि नए सिरे से पितृसत्तात्मक चिंताओं, तनावों एवं हिंसा में भी बदलाव आया है.
- इन परिवर्तनों के मुकाबले परंपरागत जातीय पितृसत्ता की शक्तियां नए सिरे से हमलों के जरिये अपनी ताकत दिखला रही हैं ताकि महिलाओं की लैंगिकता, गतिशीलता एवं प्रजनन शक्ति पर नियंत्रण बरकरार रखा जा सके तथा जमीन और संपत्ति की पितृसत्तात्मक व सामंती व्यवस्थाओं को, जिन्हें महिलाओं को हासिल नये अधिकारों एवं उनकी दावेदारी से खतरा पहुंच रहा है, बचाया जा सके. ये शक्तियां न केवल सामंती अतीत की झलक हैं, बल्कि वे आधुनिक युग के अनुसार अपने को नए सिरे से ढाल रही हैं. अकसरहा इन्हें शासक वर्ग की तमाम राजनीतिक पार्टियों द्वारा संरक्षण मिलता रहता है. यहां ध्यान देने योग्य बात है कि पितृसत्तात्मक प्रतिक्रिया की शक्तियां उन क्षेत्रों में, जहां हरित क्रांति और कृषि में पूंजीवादी विकास का सबसे ज्यादा असर दिखाई पड़ा है - मसलन, पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश - सर्वाधिक संगठित और आक्रामक दिखती हैं.
- इसे नोट किया जाना चाहिये कि पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियां जिनके साथ अकसर जातीय एवं साम्प्रदायिक पुनरुत्थानवाद जुड़ा रहता है, शहरी परिप्रेक्ष्य में भी सशक्त तौर पर उपस्थित हैं, जिनके दायरे में पेशेवर मध्यवर्ग भी आता है. महिलाओं की दावेदारी के खिलाफ सम्पूर्ण पितृसत्तात्मक प्रतिक्रिया को फ्परिवार बचाओ” किस्म के संगठनों की शक्ल में भी देखा जा सकता है, जो महिलाओं पर हिंसा के खिलाफ बनाये गये कानूनों को अपना निशाना बनाती हैं. शहरी केन्द्रों में पेशेवर मध्यवर्ग के बीच इस किस्म की व्यापक और जहरीली पितृसत्तात्मक दावेदारी को आधुनिकता की सतही चमक के तले नहीं छिपाया जा सकता.
- पितृसत्ता के खिलाफ महिलाओं की दावेदारी और प्रतिरोध, जो परिवार, कुटुम्ब, समुदाय, सार्वजनिक संस्थाओं और राज्य में अभिव्यक्त होते हैं, आज भारत में जनवाद और क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव की लड़ाई का एक प्रमुख रणक्षेत्र बन गया है और इसे समग्र कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए एक मुख्य क्रांतिकारी कार्यभार के रूप में आत्मसात करना होगा.
महिलाओं पर हिंसा
- महिलाओं पर हिंसा पूरे देश में, खास तौर पर कुछेक राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, असम में, एक केंद्रीय मुद्दे के रूप में सामने आई है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबीद्ध के आंकड़ों के मुताबिक देश में बलात्कार की घटनाओं में 1971 के बाद 791 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि बलात्कार के मामले में सजा की दर 1971 में 41 प्रतिशत से घटकर 2010 में 27 प्रतिशत पर गिर गई है.
- महिला आंदोलनों के द्वारा दीर्घकालीन अभियानों ने सरकार को महिलाओं पर होने वाली हिंसा के विरुद्ध नये कानून बनाने को बाध्य किया है. घरेलू हिंसा और यौन शोषण को कानूनी मान्यता मिल रही है, और बलात्कार कानूनों में संशोधनों ने यौन-उत्पीड़न की परिभाषा को व्यापक बनाकर उसके दायरे में यौन-आक्रमण के विविध रूपों को शामिल किया है. फिर भी, इनमें से अधिकांश कानून पितृसत्तात्मक प्रस्थापनाओं को बरकरार रखे हुए हैं. मसविदा क्रिमिनल प्रोसीजर (अमेंडमेंटद्ध बिल, 2011 में खास तौर पर वैवाहिक रेप को इसके दायरे से बाहर कर दिया गया है, और यह बिल खास तौर पर संगठित सांप्रदायिक एवं जातीय हिंसा के दौरान हुए बलात्कार और सेना की हिरासत में हुए बलात्कार के मुद्दों को सम्बोधित करने में भी नाकाम रहा है, हालांकि इसमें पुलिस अफसरों, सरकारी अधिकारियों, जेल प्रबंधन और कर्मचारियों द्वारा हिरासत में बलात्कार, अस्पतालों, रिमांड होम आदि में बलात्कार तथा गिरोहों द्वारा किए गये यौन आक्रमणों को संज्ञान में लेता है और इन मामलों में ज्यादा कठोर सजा देने का प्रावधान करता है. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामले में बिल में 'झूठी' शिकायत पर महिलाओं को दंडित करने की बात कही गई है - यह एक ऐसा कदम है, जिससे महिलाएं शिकायत दर्ज करने से डरेंगी, और इस बिल में अभी भी तमाम महिलाओं - जिनमें छात्राएं, सशस्त्र बल में कार्यरत महिलाएं और कृषि कार्य में लगी महिलाएं शामिल हैं - को उनके कार्य-स्थल में सुरक्षा देना बाकी है. सरकार को अभी भी घरेलू हिंसा कानून को पुख्ता करने के लिये हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए कारगर आश्रय की व्यवस्था करना बाकी है. इसके अलावा, सरकार ने कई मौकों पर महिला-विरोधी शक्तियों के दबाव में घुटने टेक दिये हैं. उदाहरणस्वरूप, आजकल केन्द्र सरकार ने दहेज-विरोधी कानून के खिलाफ सुनियोजित ढंग से चलाई जा रही मुहिम के सामने आत्मसमर्पण करके धारा 498-ए (गंभीर घरेलू हिंसा और दहेज संबंधी यातना) में संशोधन का प्रस्ताव किया है.
- लैंगिक हिंसा खुद जितनी व्यापक है, उतनी ही व्यापक वह प्रवृत्ति है, जो न केवल व्यक्तियों और समूहों, बल्कि सार्वजनिक हस्तियों - पुलिस, राजनीतिज्ञ, न्यायपालिका - द्वारा महिलाओं की वेशभूषा, व्यवहार और पारिवारिक मूल्यों के बारे में पितृसत्तात्मक कोड को लागू करके पीड़िता को दोषी ठहराकर हिंसा को उचित सिद्ध करने के रूप में अभिव्यक्त होता है. इस पितृसत्तात्मक 'लोकमत' को चुनौती देना महिलाओं पर हिंसा के खिलाफ प्रतिरोध का एक प्रमुख मुद्दा होना चाहिये.
- जन आंदोलनों पर प्रतिक्रियावादी हमले के लिए यौन हिंसा अब भी राज्य के हाथों एक हथियार बना हुआ है. आदिवासी स्कूल शिक्षिका सोनी सूरी के साथ छत्तीसगढ़ में पुलिस हिरासत में बलात्कार और यौन-यातना, उत्तर-पूर्व में सशस्त्र बलों द्वारा महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या, और कारपोरेट भूमि-हड़प का प्रतिरोध करने वाली तपसी मलिक जैसी महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या आज के महिला आंदोलन में संघर्ष की गोलबंदी के केन्द्र बनकर उभरे हैं. वर्ष 2010 में कश्मीर की सड़कों पर राज्य दमन के खिलाफ संघर्षों में सैकड़ों महिलाओं की जुझारू भागीदारी और वर्ष 2004 में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के खिलाफ मणिपुरी महिलाओं का प्रतिवाद विशेष रूप से प्रेरणादायक हैं.
- यौन हिंसा आज भी सांप्रदायिक एवं जातीय अत्याचारों का केन्द्रीय अंग बनी हुई है. 2002 में गुजरात, 2008 में कंधमाल और 2006 में खैरलांजी के जनसंहारों के दौरान हुई यौन हिंसा इसके प्रमुख उदाहरण हैं. पूरे देश में दलित और पिछड़ी जातियों की सामाजिक एवं राजनीतिक दावेदारी का मुकाबला हिंसक सामंती प्रतिक्रिया द्वारा किया जा रहा है. इन उत्पीड़ित समुदायों की महिलाओं को खास तौर पर सामंती ताकतों द्वारा किए गये सार्वजनिक अपमान और यौन-हिंसा का मुख्य शिकार बनना पड़ता है. धार्मिक संस्थाओं के अंदर तथाकथित बाबाओं द्वारा महिलाओं का यौन-शोषण एवं उनसे दुर्व्यवहार भी एक सामान्य परिघटना बन गई है.
- महिलाओं, खासकर नवयुवतियों की, शिक्षा, रोजगार, संपत्ति में भागीदारी और जीवन-साथी चुनने की स्वाधीनता समेत व्यक्तिगत जीवन में अधिक स्वायत्तता की दावेदारी जातीय व्यवस्था और संपत्ति के हस्तांतरण के पितृसत्तात्मक नियमों के सामने खतरा बन गई है, और यह दावेदारी खुले पितृसत्तात्मक हमलों का सामना कर रही है. कई बार यह आक्रामकता पितृसत्ता एवं पारिवारिक प्राधिकार के 'दयालु' प्रदर्शन का रूप धारण कर लेती है, जो महिलाओं से वंशगत 'वफादारी' दिखलाने तथा भारतीय माओं एवं पत्नियों के 'पवित्रा कर्तव्यों और नैतिक गुणों' के प्रदर्शन की अपील करता है. अन्य मामलों में यह परिवार के भीतर 'ऑनर' क्राइम (झूठी इज्जत के नाम पर किए जा रहे अपराधों) का रूप ले लेता है. निरंतर बढ़ते 'ऑनर' क्राइम और नैतिक निगरानी ने संगठित सामाजिक-राजनीतिक स्वरूप अख्तियार कर लिया है, जिसमें संघ परिवार की संस्थाएं, खाप पंचायतें और सभी धर्मों के प्रतिक्रियावादी संगठन जातीय, धार्मिक और पितृसत्तात्मक फरमानों को मनवाने के लिए संगठित हमले कर रहे हैं.
- ऐसी संगठित शक्तियों के खिलाफ, जो नैतिक निगरानी और 'ऑनर' क्राइम में लिप्त हैं, कार्रवाई करने में सरकार की रुचि बहुत ही कम है, बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि इस मामले में राजनीतिक शक्तियों और राज्य मशीनरी के बीच ऊंचे दर्जे की सांठगांठ है. 'ऑनर' क्राइम के बहुतेरे मामलों में वर्चस्वशाली जातियों के लोग ही विवाह में जातीय सीमाओं को तोड़ने के कारण अपनी जाति की महिलाओं के साथ, और साथ ही शोषित जाति की महिलाओं के ऊपर, हिंसक कार्रवाई करते हैं. लेकिन 'ऑनर' क्राइम केवल वर्चस्वशाली जातियों द्वारा ही नहीं किए जाते. उत्पीड़ित जातियों और आदिवासी समुदायों, जिन्हें वर्चस्वशाली जातियों द्वारा 'सम्मान' पाने योग्य ही नहीं समझा जाता, ने भी अपने समुदायों के भीतर महिलाओं की लैंगिकता और आजादी पर नियंत्रण कायम करने के जरिये पितृसत्तात्मक 'ऑनर' पर अपना दावा करना शुरू कर दिया है.
- महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा हर जाति एवं वर्ग में बेलगाम जारी है. यह लोकतंत्र में बुनियादी कमी और असमानता का निर्मम सूचक है, जो पितृसत्तात्मक समाज में महिला-पुरुष के बीच के संबंध और विवाह की संस्था और परिवार को पुख्ता करता है. महिलाओं का रोजगार असुरक्षित होने तथा रोजगार के अभाव के कारण उन्हें अपमानजनक शादी में बंधकर और अधिक असुरक्षा का शिकार बनना पड़ता है.
- लिंग निर्धारण के बाद गर्भपात और मादा-शिशु हत्या की परिघटना ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में, खास तौर पर संपन्न लोगों में, जिन्हें जन्म-पूर्व लिंग निर्धारण तकनीक ज्यादा आसानी से उपलब्ध होती है, लगातार पनप रही है. नवीनतम जनगणना के आंकड़े दर्शाते हैं कि 0-6 वर्ष आयु-समूह की लड़कियों की संख्या आजादी के बाद से अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है - प्रति 1000 लड़कों पर मात्रा 914 लड़कियां. राज्य व केंद्र की सरकारें जानबूझकर पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट (गर्भधारण-पूर्व एवं प्रसव-पूर्व नैदानिक तकनीक ऐक्ट, 1994) को लागू करने में शिथिलता बरतती रही हैं, और इस प्रकार वे प्रसव-पूर्व लिंग-निर्धारण एवं मादा भ्रूण हत्या/गर्भपात से संबंधित अनैतिक चिकित्सा उद्योग को बेलगाम फलने-फूलने का मौका दे रही है. अतः पीसी एंड पीएनडीटी ऐक्ट को लागू करने के साथ-साथ, यह भी स्पष्ट है कि पुत्रोत्पत्ति को वरीयता और मादा भू्रण होने पर गर्भपात के खिलाफ प्रतिरोध केवल तभी किया जा सकता है जब उसके साथ-साथ पितृसत्ता का मुकाबला करने तथा समाज में महिलाओं की औकात और मर्यादा को बढ़ाने वाले ढेर सारे अन्य कदमों को भी लागू किया जाय.
- हिंसा के खिलाफ एक सशक्त, बहु-स्तरीय प्रतिरोध का निर्माण करना होगा, जिसमें निम्नलिखित कार्यभार शामिल हैं - महिला-पक्षधर कानूनों को लागू करने के लिये अभियान छेड़ना ( महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने एवं उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने में नाकाम सरकारों एवं राजनीतिक शक्तियों के खिलाफ प्रतिवाद करना ( और महिलाओं के मुहल्ला-स्तरीय सतर्कता-समूहों का निर्माण, उत्पीड़न की शिकार महिला को दोषी ठहराने, पुत्रोत्पत्ति को वरीयता देने, घरेलू हिंसा, ऑनर अपराध के खिलाफ और शिक्षा, प्रेम, विवाह, वेशभूषा और जीवन-शैली समेत जीवन के सभी क्षेत्रों में महिलाओं के स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार के समर्थन में सृजनात्मक अभियान जैसी सामाजिक पहलकदमियां ग्रहण करना.